सर्दियों की छुट्टी लगने वाली थी, मन इसी खुशी से फूले नहीं समाता था। वैसे तो कभी पढ़ने का टाइम टेबल नहीं बनाया था पर छुट्टियों का पूरा सदपुयोग कैसे करना है इसका पुरा गणित दिमाग में बैठ चुका था, हर खेल की लिस्ट तैयार थी। छुट्टियां लग गईं, और मैं आजाद हो गया। ये बिल्कुल ऐसा अनुभव था जैसे कोई पंछी पिंजड़े के कैद से मुक्त हो गया हो, कोई कैदी जेल से रिहा होकर अब स्वतन्त्र हो। न कोई पाबंदी, न सुबह उठने का कोई फिक्र और न ही वो दस से चार की कैद। जैसा सुखद अनुभव कोई छात्र छुट्टियों के दौरान महसूस करता है वो शायद ही पूरे जीवन में कभी करता हो। आप पैसे कमा लें, बंगला बना लें, अपनी सारी आकांक्षाओं की प्राप्ति कर लें लेकिन वैसा सुख शायद कभी प्राप्त न होगा।
स्कूलों का रिवाज हुआ करता है, छुट्टी से पहले बच्चों को होमवर्क देनें का सो हमें भी मिला। इस होमवर्क नाम के चीज़ से अप्रिय मुझे शायद कोई और दूसरी चीज न थी, और शायद आज भी नहीं है। मैं इसे अपनीं आज़ादी का हनन मानता था, आखिर जब छुट्टियाँ मिली हैं तो खेलने कूदने के लिए ही तो मिली हैं वरना पढ़ाई तो स्कूल के दौरान हम करते ही हैं फिर इस छुट्टी नाम की आज़ादी पर इस होमवर्क नाम की बेड़ियाँ क्यों ? ये तो सरासर अत्याचार है। यदि मुझे कानून बनाने का मौका मिलता तो छुट्टियों के दौरान होमवर्क देने को मैं जघन्य अपराधों की सूची में डाल देता। लेकिन होमवर्क ऐसा काम था जिसे चाहो या न चाहो करना ही पड़ता था, इसमें सीखने की चाह बिल्कुल न थी ये तो सिर्फ मास्टर जी की बेतों का भय था। होमवर्क न करने पर स्कूल में अच्छी खासी धुनाई हो जाती थी। उस जमाने में उस बेंत का इतना भय था कि आज शायद बंदूक से भी न हो।
खेल कूद का दौर शुरू हुआ, छुट्टियाँ थी इसलिए घर पर भी कोई पढ़ने को न बोलता था। एक दो दिन ऐसे ही गुजर गए। तकरीबन पंद्रह दिनों की छुट्टियाँ मिली थी इसलिये लगता था अभी तो बहुत दिन पड़े हैं होमवर्क हो ही जाएगा, आज का दिन तो गया कल से जरूर शुरू कर दूंगा। खुद से ये झूठ बोलते बोलते दस दिन गुजर गए और अभी तक मैंने बस्ते को छुआ भी नहीं था। इस खेल कूद के मायाजाल में मैं ऐसा फसा हुआ था कि चाह कर भी निकलना असंभव सा था, खेल खुद के दौरान भी दिमाग में होमवर्क की चिंता बनी ही रहती थी और जैसे जैसे दिन कम होते जाते वो चिंता बढ़ती जाती। खुद को कोसता, भगवान की कसमें खाता, दुआएँ मांगता लेकिन भगवान मुझे न सुनने को जैसे वचनबद्ध थे।
आखिरकार छुट्टियाँ खत्म हो गईं, और मैंने छुट्टियों से पहले जहाँ पर बस्ते को फेंका था अब भी वहीं पर पड़ा हुआ था। आज स्कूल जाना था, पर होमवर्क के बिना कैसे ? ये चिंता मुझे मन ही मन मारे डाल रही थी। बार बार मास्टर जी की छड़ी आंखों के सामने गुजरती जैसे कि मेरे ही इंतजार में बैठी हो। कुछ न सूझता था, सोचता था काश बीमार ही पड़ गया होता तो ये बला टल जाती। घर पर पेट दर्द के बहाने भी किये पर इसका दोषरोपड मेरे अबोध खेलों पर मढ़ा गया। सारी तैयारियां हो चुकी थी अब घड़ी भी चढ़ चुकी थी। स्कूल के लिए निकलना ही पड़ा, कभी साहस बांधता की मार खा लूंगा, अब जो पाप किया है उसका प्रयाश्चित भी तो मुझे ही करना पड़ेगा, और कौन सा मैं अकेला रहूंगा, मुझ जैसे दो चार जरूर होंगे। पर उस छड़ी का खौफ मेरे आत्मबल पर भारी पड़ता।
अब कोई न कोई रास्ता निकालना ही था, अंततः एक तरकीब सूझी, क्यों न आज स्कूल से ही भाग लिया जाए, घरवालों को लगेगा स्कूल में हूँ और स्कूल वालों को घरपर। शाम छुट्टी के वक़्त घर पहुंच जाऊंगा। स्कूल से भागने वाले किस्से मैं अक्सर सुना करता था, कुछ लड़कों को जानता भी था और उन्हें हीन दृष्टि से देखा भी करता था पर आज बचनें का यही एक उपाय था। और कलंक तो तभी लगेगा जब किसी को पता चलेगा, मैं किसी को पता लगने ही न दूँगा।
फैसला हो चुका था, अब तक मैं स्कूल का आधा रास्ता तय भी कर चुका था, पर अब जाऊं कहाँ तभी घर के ऊपर रखी बड़ी टंकी की याद आई। ये टंकी खाली ही रहती थी और मैं इसमें घुसने और निकलने की कला में पारंगत हो चुका था। बस अब इतना ही काम बचा था कि घर की उस टंकी पर पहुंचा जाए माँ की नजरों से बचकर। मैं अबतक उल्टा रास्ता पकड़ चुका था और घर के आसपास भी कोई नहीं था। मौका देखते है मैं अपनी मंजिल तक पहुंच गया। उस एक मीटर के व्यास वाली कैद में भी मुझे आज़ादी दिखाई दे रही थी, न अब होमवर्क की चिंता थी न ही छड़ी की। सिर्फ चिंता थी तो शाम वापस घर जानें की।
भले ही कडकडाती ठंड का मौसम था पर उस टंकी के अंदर न जानें कहाँ की गर्मी थी। अंदर दम घुटता था। बीच बीच में हवा खाने बाहर भी निकल आता और इसी बीच कुछ लोगों की निगाहें भी मुझ पर पड़ चुकी थी। दिन बीतता जाता और मैं शाम की प्रतीक्षा में मग्न था। आखिरकार छुट्टी का समय हुआ, और मै बचते बचाते चोरों जैसा बाहर आ गया। स्कूल के कुछ बच्चे लौटते हुए दिखाई पड़े, और मैं फौरन दौड़ कर घर पहुंच आया।
आखिरकार वो बला टल ही गई, अब कल कोई स्कूल में होमवर्क को भी न पूछेगा। इसी ख्याल में मैं मग्न ही था स्कूल से एक लड़का घर पहुंच आया, शायद उसने मुझे स्कूल यूनिफार्म में देखा था और स्कूल में न मिलने पर घर चला आया था। मैं अब भी यूनिफार्म में ही था, उसे देखकर झट से अंदर चला आया और कपड़े बदलने लगा। तभी एक आवाज आई कि "ये आज स्कूल क्यों नही आया था"? दिल धक किया, चेहरा लाल पीला हो उठा, आंखों के सामनें अंधेरा सा छा गया।
पिताजी उससे बात कर रहे थे, उनकी नजरों में तो मैं स्कूल में था। मैं बाहर आया और उस लड़के को जैसे तैसे वापस भेजा। अब मेरे सर पर काल मंडरा रहा था, पिताजी के हाथों पहले एक दो बार पिटाई हो चुकी थी और वो मास्टर जी की छड़ी से कई गुना घातक थी। अब पेशी का समय था, मुझपर प्रश्न दागे गए, मैने उस लड़के के सारे दावों को सरासर खारिज कर दिया। अंततः स्कूल फोन घुमाया गया और मेरी पोल खुल गई, काटो तो खून नहीं। मुझे जैसे सांप सूंघ गया था। मेरी माताश्री पिताजी से भी ज्यादा ग़ुस्सेवाली हैं, वो आग में और घी डालने का काम कर रहीं थी। मुझे इन सब के बीच सिर्फ अब पिटने का ही इन्तेजार था, और तो अब मैं कुछ कर भी न सकता था। मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें सिर्फ छड़ी दिखा भर दो तो रोने लगते थे पर मेरे साथ ऐसा कुछ भी न था, मैं कइयों बार फिल्मे देखते हुए रो चुका था, कहानियाँ पढ़ते वक्त आंखे डबडबा चुकी थी पर छड़ी देखकर कभी न रोया था। रोने से पिटाई थोड़ी कम होती है ये बात मुझे अच्छे से मालूम थी, पर यहाँ चाह कर भी आंसू नहीं निकल रहे थे। इन्ही सब खयालों के बीच मुझ पर आक्रमण हो गया, माताजी झाड़ूओं से मारती थी और पिताजी के तो हाथ ही काफी थे। मेरा शरीर भी मेरे इन्द्रियों के वश में हो चुका था, मुझे सिर्फ मार की आवाज़ें सुनाई देती पर लगता तनिक भी न था। छोटी बहन छिप कर सारा तमाशा देख रही थी, पर वो करती भी क्या ? भैया ने कौन सा स्वर्ण पदक जीता है जो वाहवाही हो, स्कूल से भाग कर कौन सा बहादुरी वाला काम किया है ?
अब पिटाई का कार्यक्रम थम चुका था, जिस तूफान से मैं अबतक दूर भाग रहा था वह मुझे अब रौंद कर जा चुका था। मैं अब मार खाकर चुपचाप अपने कमरे में बैठ गया। सिर्फ एक लज्जा ही थी जो मुझे घेरे हुए थी, पर अपने करे पर मुझे कोई पछतावा न था। मैंने सारी मार भी शान के साथ सहन कर ली थी, पर अब दूसरी चिंता पीछे पड़ चुकी थी। अगर वो लड़का कल मास्टर जी से शिकायत कर दे तो वहाँ दुगनी पिटाई होगी और इस बार तो मैं अकेला ही रहूंगा, होमवर्क वाले तो अब तक पिट चुके होंगे।
तभी माताजी अंदर आई। माँ का दिल भी बहुत बड़ा होता है, वह अपने बच्चे को मारे पिटे पर दुनियां में सबसे ज्यादा प्यार अपने बच्चे से ही करती है। अब मेरी आँखें भर आईं और मैं रोने लगा, ये पता नही क्यों पर मैं रोये जा रहा था। शायद ये कल पिटने का भय था जो आंखों से निकल रहा था। माँ ने जब कारण पूछा तो मैंने झूठ बोल दिया कि इतनी दिन की छुट्टियाँ मनाने के बाद आज बिल्कुल भी स्कूल जानें कि इच्छा न थी, उन्हें मैं होमवर्क वाला कारण बता भी न सकता था।
दूसरा दिन हुआ, आज तो स्कूल जाना ही था। आज तो पिछले दिन से भी ज्यादा विचार दिमाग में आ रहे थे, कि जब लड़कों को पता चलेगा कि मैं स्कूल से भागा था तो क्या इज्जत रह जाएगी ? मैं हँसी का पात्र हो जाऊँगा, अब मुझे भी लोग हीन दृष्टि से देखेंगे। इज्जतदार लोगों के लिए इज्जत जान से भी ज्यादा कीमती होती है ये बात मुझे भलीभांति पता थी। दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धांत मैंने पढ़ रखा था पर सब कुछ सिर्फ जुबां पर ही था मष्तिष्क में नहीं। आज ऐसा समय था कि मैं उससे भी अच्छे तरीके से इस सिद्धांत की व्याख्या कर सकता था। समाज इंसान का शत्रु होता है, ये बात मुझे आज समझ आई। मैं उस दिन को कोस रहा था जब पिताजी ने मुझे कान्वेंट स्कूल में भेजने को बोला था और मैंने मना कर दिया था, वहाँ पर मार नहीं पड़ती, ज्यादा से ज्यादा डाँट दिया जाता है बस वो बहुत है। पर मैं अभागा इतना गलत निर्णय सिर्फ आज के दिन को देखने के लिए ही लिया था।
तभी पिताजी ने बुलाया और पूछा आज स्कूल में क्या जवाब दोगे जब पूछा जाएगा कल क्यों नहीं आये थे ? मैं खामोश रह गया। तब पिताजी ने एक सादा कागज और कलम मुझसे मंगाई और एक चिट्ठी तैयार की, जिसमें तबियत खराब का बहाना था। बस अब मेरे जान में जान आ चुकी थी, मुझे उस समय पिताजी में साक्षात ईश्वर के दर्शन हो रहे थे। फिर क्या था मैं फौरन स्कूल के लिए तैयार हुआ और स्कूल पहुंच गया।।।
स्कूलों का रिवाज हुआ करता है, छुट्टी से पहले बच्चों को होमवर्क देनें का सो हमें भी मिला। इस होमवर्क नाम के चीज़ से अप्रिय मुझे शायद कोई और दूसरी चीज न थी, और शायद आज भी नहीं है। मैं इसे अपनीं आज़ादी का हनन मानता था, आखिर जब छुट्टियाँ मिली हैं तो खेलने कूदने के लिए ही तो मिली हैं वरना पढ़ाई तो स्कूल के दौरान हम करते ही हैं फिर इस छुट्टी नाम की आज़ादी पर इस होमवर्क नाम की बेड़ियाँ क्यों ? ये तो सरासर अत्याचार है। यदि मुझे कानून बनाने का मौका मिलता तो छुट्टियों के दौरान होमवर्क देने को मैं जघन्य अपराधों की सूची में डाल देता। लेकिन होमवर्क ऐसा काम था जिसे चाहो या न चाहो करना ही पड़ता था, इसमें सीखने की चाह बिल्कुल न थी ये तो सिर्फ मास्टर जी की बेतों का भय था। होमवर्क न करने पर स्कूल में अच्छी खासी धुनाई हो जाती थी। उस जमाने में उस बेंत का इतना भय था कि आज शायद बंदूक से भी न हो।
खेल कूद का दौर शुरू हुआ, छुट्टियाँ थी इसलिए घर पर भी कोई पढ़ने को न बोलता था। एक दो दिन ऐसे ही गुजर गए। तकरीबन पंद्रह दिनों की छुट्टियाँ मिली थी इसलिये लगता था अभी तो बहुत दिन पड़े हैं होमवर्क हो ही जाएगा, आज का दिन तो गया कल से जरूर शुरू कर दूंगा। खुद से ये झूठ बोलते बोलते दस दिन गुजर गए और अभी तक मैंने बस्ते को छुआ भी नहीं था। इस खेल कूद के मायाजाल में मैं ऐसा फसा हुआ था कि चाह कर भी निकलना असंभव सा था, खेल खुद के दौरान भी दिमाग में होमवर्क की चिंता बनी ही रहती थी और जैसे जैसे दिन कम होते जाते वो चिंता बढ़ती जाती। खुद को कोसता, भगवान की कसमें खाता, दुआएँ मांगता लेकिन भगवान मुझे न सुनने को जैसे वचनबद्ध थे।
आखिरकार छुट्टियाँ खत्म हो गईं, और मैंने छुट्टियों से पहले जहाँ पर बस्ते को फेंका था अब भी वहीं पर पड़ा हुआ था। आज स्कूल जाना था, पर होमवर्क के बिना कैसे ? ये चिंता मुझे मन ही मन मारे डाल रही थी। बार बार मास्टर जी की छड़ी आंखों के सामने गुजरती जैसे कि मेरे ही इंतजार में बैठी हो। कुछ न सूझता था, सोचता था काश बीमार ही पड़ गया होता तो ये बला टल जाती। घर पर पेट दर्द के बहाने भी किये पर इसका दोषरोपड मेरे अबोध खेलों पर मढ़ा गया। सारी तैयारियां हो चुकी थी अब घड़ी भी चढ़ चुकी थी। स्कूल के लिए निकलना ही पड़ा, कभी साहस बांधता की मार खा लूंगा, अब जो पाप किया है उसका प्रयाश्चित भी तो मुझे ही करना पड़ेगा, और कौन सा मैं अकेला रहूंगा, मुझ जैसे दो चार जरूर होंगे। पर उस छड़ी का खौफ मेरे आत्मबल पर भारी पड़ता।
अब कोई न कोई रास्ता निकालना ही था, अंततः एक तरकीब सूझी, क्यों न आज स्कूल से ही भाग लिया जाए, घरवालों को लगेगा स्कूल में हूँ और स्कूल वालों को घरपर। शाम छुट्टी के वक़्त घर पहुंच जाऊंगा। स्कूल से भागने वाले किस्से मैं अक्सर सुना करता था, कुछ लड़कों को जानता भी था और उन्हें हीन दृष्टि से देखा भी करता था पर आज बचनें का यही एक उपाय था। और कलंक तो तभी लगेगा जब किसी को पता चलेगा, मैं किसी को पता लगने ही न दूँगा।
फैसला हो चुका था, अब तक मैं स्कूल का आधा रास्ता तय भी कर चुका था, पर अब जाऊं कहाँ तभी घर के ऊपर रखी बड़ी टंकी की याद आई। ये टंकी खाली ही रहती थी और मैं इसमें घुसने और निकलने की कला में पारंगत हो चुका था। बस अब इतना ही काम बचा था कि घर की उस टंकी पर पहुंचा जाए माँ की नजरों से बचकर। मैं अबतक उल्टा रास्ता पकड़ चुका था और घर के आसपास भी कोई नहीं था। मौका देखते है मैं अपनी मंजिल तक पहुंच गया। उस एक मीटर के व्यास वाली कैद में भी मुझे आज़ादी दिखाई दे रही थी, न अब होमवर्क की चिंता थी न ही छड़ी की। सिर्फ चिंता थी तो शाम वापस घर जानें की।
भले ही कडकडाती ठंड का मौसम था पर उस टंकी के अंदर न जानें कहाँ की गर्मी थी। अंदर दम घुटता था। बीच बीच में हवा खाने बाहर भी निकल आता और इसी बीच कुछ लोगों की निगाहें भी मुझ पर पड़ चुकी थी। दिन बीतता जाता और मैं शाम की प्रतीक्षा में मग्न था। आखिरकार छुट्टी का समय हुआ, और मै बचते बचाते चोरों जैसा बाहर आ गया। स्कूल के कुछ बच्चे लौटते हुए दिखाई पड़े, और मैं फौरन दौड़ कर घर पहुंच आया।
आखिरकार वो बला टल ही गई, अब कल कोई स्कूल में होमवर्क को भी न पूछेगा। इसी ख्याल में मैं मग्न ही था स्कूल से एक लड़का घर पहुंच आया, शायद उसने मुझे स्कूल यूनिफार्म में देखा था और स्कूल में न मिलने पर घर चला आया था। मैं अब भी यूनिफार्म में ही था, उसे देखकर झट से अंदर चला आया और कपड़े बदलने लगा। तभी एक आवाज आई कि "ये आज स्कूल क्यों नही आया था"? दिल धक किया, चेहरा लाल पीला हो उठा, आंखों के सामनें अंधेरा सा छा गया।
पिताजी उससे बात कर रहे थे, उनकी नजरों में तो मैं स्कूल में था। मैं बाहर आया और उस लड़के को जैसे तैसे वापस भेजा। अब मेरे सर पर काल मंडरा रहा था, पिताजी के हाथों पहले एक दो बार पिटाई हो चुकी थी और वो मास्टर जी की छड़ी से कई गुना घातक थी। अब पेशी का समय था, मुझपर प्रश्न दागे गए, मैने उस लड़के के सारे दावों को सरासर खारिज कर दिया। अंततः स्कूल फोन घुमाया गया और मेरी पोल खुल गई, काटो तो खून नहीं। मुझे जैसे सांप सूंघ गया था। मेरी माताश्री पिताजी से भी ज्यादा ग़ुस्सेवाली हैं, वो आग में और घी डालने का काम कर रहीं थी। मुझे इन सब के बीच सिर्फ अब पिटने का ही इन्तेजार था, और तो अब मैं कुछ कर भी न सकता था। मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें सिर्फ छड़ी दिखा भर दो तो रोने लगते थे पर मेरे साथ ऐसा कुछ भी न था, मैं कइयों बार फिल्मे देखते हुए रो चुका था, कहानियाँ पढ़ते वक्त आंखे डबडबा चुकी थी पर छड़ी देखकर कभी न रोया था। रोने से पिटाई थोड़ी कम होती है ये बात मुझे अच्छे से मालूम थी, पर यहाँ चाह कर भी आंसू नहीं निकल रहे थे। इन्ही सब खयालों के बीच मुझ पर आक्रमण हो गया, माताजी झाड़ूओं से मारती थी और पिताजी के तो हाथ ही काफी थे। मेरा शरीर भी मेरे इन्द्रियों के वश में हो चुका था, मुझे सिर्फ मार की आवाज़ें सुनाई देती पर लगता तनिक भी न था। छोटी बहन छिप कर सारा तमाशा देख रही थी, पर वो करती भी क्या ? भैया ने कौन सा स्वर्ण पदक जीता है जो वाहवाही हो, स्कूल से भाग कर कौन सा बहादुरी वाला काम किया है ?
अब पिटाई का कार्यक्रम थम चुका था, जिस तूफान से मैं अबतक दूर भाग रहा था वह मुझे अब रौंद कर जा चुका था। मैं अब मार खाकर चुपचाप अपने कमरे में बैठ गया। सिर्फ एक लज्जा ही थी जो मुझे घेरे हुए थी, पर अपने करे पर मुझे कोई पछतावा न था। मैंने सारी मार भी शान के साथ सहन कर ली थी, पर अब दूसरी चिंता पीछे पड़ चुकी थी। अगर वो लड़का कल मास्टर जी से शिकायत कर दे तो वहाँ दुगनी पिटाई होगी और इस बार तो मैं अकेला ही रहूंगा, होमवर्क वाले तो अब तक पिट चुके होंगे।
तभी माताजी अंदर आई। माँ का दिल भी बहुत बड़ा होता है, वह अपने बच्चे को मारे पिटे पर दुनियां में सबसे ज्यादा प्यार अपने बच्चे से ही करती है। अब मेरी आँखें भर आईं और मैं रोने लगा, ये पता नही क्यों पर मैं रोये जा रहा था। शायद ये कल पिटने का भय था जो आंखों से निकल रहा था। माँ ने जब कारण पूछा तो मैंने झूठ बोल दिया कि इतनी दिन की छुट्टियाँ मनाने के बाद आज बिल्कुल भी स्कूल जानें कि इच्छा न थी, उन्हें मैं होमवर्क वाला कारण बता भी न सकता था।
दूसरा दिन हुआ, आज तो स्कूल जाना ही था। आज तो पिछले दिन से भी ज्यादा विचार दिमाग में आ रहे थे, कि जब लड़कों को पता चलेगा कि मैं स्कूल से भागा था तो क्या इज्जत रह जाएगी ? मैं हँसी का पात्र हो जाऊँगा, अब मुझे भी लोग हीन दृष्टि से देखेंगे। इज्जतदार लोगों के लिए इज्जत जान से भी ज्यादा कीमती होती है ये बात मुझे भलीभांति पता थी। दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धांत मैंने पढ़ रखा था पर सब कुछ सिर्फ जुबां पर ही था मष्तिष्क में नहीं। आज ऐसा समय था कि मैं उससे भी अच्छे तरीके से इस सिद्धांत की व्याख्या कर सकता था। समाज इंसान का शत्रु होता है, ये बात मुझे आज समझ आई। मैं उस दिन को कोस रहा था जब पिताजी ने मुझे कान्वेंट स्कूल में भेजने को बोला था और मैंने मना कर दिया था, वहाँ पर मार नहीं पड़ती, ज्यादा से ज्यादा डाँट दिया जाता है बस वो बहुत है। पर मैं अभागा इतना गलत निर्णय सिर्फ आज के दिन को देखने के लिए ही लिया था।
तभी पिताजी ने बुलाया और पूछा आज स्कूल में क्या जवाब दोगे जब पूछा जाएगा कल क्यों नहीं आये थे ? मैं खामोश रह गया। तब पिताजी ने एक सादा कागज और कलम मुझसे मंगाई और एक चिट्ठी तैयार की, जिसमें तबियत खराब का बहाना था। बस अब मेरे जान में जान आ चुकी थी, मुझे उस समय पिताजी में साक्षात ईश्वर के दर्शन हो रहे थे। फिर क्या था मैं फौरन स्कूल के लिए तैयार हुआ और स्कूल पहुंच गया।।।