Tuesday, 1 August 2017

होमवर्क "एक आपबीति"

सर्दियों की छुट्टी लगने वाली थी, मन इसी खुशी से फूले नहीं समाता था। वैसे तो कभी पढ़ने का टाइम टेबल नहीं बनाया था पर छुट्टियों का पूरा सदपुयोग कैसे करना है इसका पुरा गणित दिमाग में बैठ चुका था, हर खेल की लिस्ट तैयार थी। छुट्टियां लग गईं, और मैं आजाद हो गया। ये बिल्कुल ऐसा अनुभव था जैसे कोई पंछी पिंजड़े के  कैद से मुक्त हो गया हो, कोई कैदी जेल से रिहा होकर अब स्वतन्त्र हो। न कोई पाबंदी, न सुबह उठने का कोई फिक्र और न ही वो दस से चार की कैद। जैसा सुखद अनुभव कोई छात्र छुट्टियों के दौरान महसूस करता है वो शायद ही पूरे जीवन में कभी करता हो। आप पैसे कमा लें, बंगला बना लें, अपनी सारी आकांक्षाओं की प्राप्ति कर लें लेकिन वैसा सुख शायद कभी प्राप्त न होगा।
स्कूलों का रिवाज हुआ करता है, छुट्टी से पहले बच्चों को होमवर्क देनें का सो हमें भी मिला। इस होमवर्क नाम के चीज़ से अप्रिय मुझे शायद कोई और दूसरी चीज न थी, और शायद आज भी नहीं है। मैं इसे अपनीं आज़ादी का हनन मानता था, आखिर जब छुट्टियाँ मिली हैं तो खेलने कूदने के लिए ही तो मिली हैं वरना पढ़ाई तो स्कूल के दौरान हम करते ही हैं फिर इस छुट्टी नाम की आज़ादी पर इस होमवर्क नाम की बेड़ियाँ क्यों ? ये तो सरासर अत्याचार है। यदि मुझे कानून बनाने का मौका मिलता तो छुट्टियों के दौरान होमवर्क देने को मैं जघन्य अपराधों की सूची में डाल देता। लेकिन होमवर्क ऐसा काम था जिसे चाहो या न चाहो करना ही पड़ता था, इसमें सीखने की चाह बिल्कुल न थी ये तो सिर्फ मास्टर जी की बेतों का भय था। होमवर्क न करने पर स्कूल में अच्छी खासी धुनाई हो जाती थी। उस जमाने में उस बेंत का इतना भय था कि आज शायद बंदूक से भी न हो।
खेल कूद का दौर शुरू हुआ, छुट्टियाँ थी इसलिए घर पर भी कोई पढ़ने को न बोलता था। एक दो दिन ऐसे ही गुजर गए। तकरीबन पंद्रह दिनों की छुट्टियाँ मिली थी इसलिये लगता था अभी तो बहुत दिन पड़े हैं होमवर्क हो ही जाएगा, आज का दिन तो गया कल से जरूर शुरू कर दूंगा। खुद से ये झूठ बोलते बोलते दस दिन गुजर गए और अभी तक मैंने बस्ते को छुआ भी नहीं था। इस खेल कूद के मायाजाल में मैं ऐसा फसा हुआ था कि  चाह कर भी निकलना असंभव सा था, खेल खुद के दौरान भी दिमाग में होमवर्क की चिंता बनी ही रहती थी और जैसे जैसे दिन कम होते जाते वो चिंता बढ़ती जाती। खुद को कोसता, भगवान की कसमें खाता, दुआएँ मांगता लेकिन भगवान मुझे न सुनने को जैसे वचनबद्ध थे।
आखिरकार छुट्टियाँ खत्म हो गईं, और मैंने छुट्टियों से पहले जहाँ पर बस्ते को फेंका था अब भी वहीं पर पड़ा हुआ था। आज स्कूल जाना था, पर होमवर्क के बिना कैसे ? ये चिंता मुझे मन ही मन मारे डाल रही थी। बार बार मास्टर जी की छड़ी आंखों के सामने गुजरती जैसे कि मेरे ही इंतजार में बैठी हो। कुछ न सूझता था, सोचता था काश बीमार ही पड़ गया होता तो ये बला टल जाती। घर पर पेट दर्द के बहाने भी किये पर इसका दोषरोपड मेरे अबोध खेलों पर मढ़ा गया। सारी तैयारियां हो चुकी थी अब घड़ी भी चढ़ चुकी थी। स्कूल के लिए निकलना ही पड़ा, कभी साहस बांधता की मार खा लूंगा, अब जो पाप किया है उसका प्रयाश्चित भी तो मुझे ही करना पड़ेगा, और कौन सा मैं अकेला रहूंगा, मुझ जैसे दो चार जरूर होंगे। पर उस छड़ी का खौफ मेरे आत्मबल पर भारी पड़ता।
अब कोई न कोई रास्ता निकालना ही था, अंततः एक तरकीब सूझी, क्यों न आज स्कूल से ही भाग लिया जाए, घरवालों को लगेगा स्कूल में हूँ और स्कूल वालों को घरपर। शाम छुट्टी के वक़्त घर पहुंच जाऊंगा। स्कूल से भागने वाले किस्से मैं अक्सर सुना करता था, कुछ लड़कों को जानता भी था और उन्हें हीन दृष्टि से देखा भी करता था पर आज बचनें का यही एक उपाय था। और कलंक तो तभी लगेगा जब किसी को पता चलेगा, मैं किसी को पता लगने ही न दूँगा।
फैसला हो चुका था, अब तक मैं स्कूल का आधा रास्ता तय भी कर चुका था, पर अब जाऊं कहाँ तभी घर के ऊपर रखी बड़ी टंकी की याद आई। ये टंकी खाली ही रहती थी और मैं इसमें घुसने और निकलने की कला में पारंगत हो चुका था। बस अब इतना ही काम बचा था कि घर की उस टंकी पर पहुंचा जाए माँ की नजरों से बचकर। मैं अबतक उल्टा रास्ता पकड़ चुका था और घर के आसपास भी कोई नहीं था। मौका देखते है मैं अपनी मंजिल तक पहुंच गया। उस एक मीटर के व्यास वाली कैद में भी मुझे आज़ादी दिखाई दे रही थी, न अब होमवर्क की चिंता थी न ही छड़ी की। सिर्फ चिंता थी तो शाम वापस घर जानें की।
भले ही कडकडाती ठंड का मौसम था पर उस टंकी के अंदर न जानें कहाँ की गर्मी थी। अंदर दम घुटता था। बीच बीच में हवा खाने बाहर भी निकल आता और इसी बीच कुछ लोगों की निगाहें भी मुझ पर पड़ चुकी थी। दिन बीतता जाता और मैं शाम की प्रतीक्षा में मग्न था। आखिरकार छुट्टी का समय हुआ, और मै बचते बचाते चोरों जैसा बाहर आ गया। स्कूल के  कुछ बच्चे लौटते हुए दिखाई पड़े, और मैं फौरन दौड़ कर घर पहुंच आया।
आखिरकार वो बला टल ही गई, अब कल कोई स्कूल में होमवर्क को भी न पूछेगा। इसी ख्याल में मैं मग्न ही था स्कूल से एक लड़का घर पहुंच आया, शायद उसने मुझे स्कूल यूनिफार्म में देखा था और स्कूल में न मिलने पर घर चला आया था। मैं अब भी यूनिफार्म में ही था, उसे देखकर झट से अंदर चला आया और कपड़े बदलने लगा। तभी एक आवाज आई कि "ये आज स्कूल क्यों नही आया था"? दिल धक किया, चेहरा लाल पीला हो उठा, आंखों के सामनें अंधेरा सा छा गया।
पिताजी उससे बात कर रहे थे, उनकी नजरों में तो मैं स्कूल में था। मैं बाहर आया और उस लड़के  को जैसे तैसे वापस भेजा। अब मेरे सर पर काल मंडरा रहा था, पिताजी के हाथों पहले एक दो बार पिटाई हो चुकी थी और वो मास्टर जी की छड़ी से कई गुना घातक थी। अब पेशी का समय था, मुझपर प्रश्न दागे गए, मैने उस लड़के  के सारे दावों को सरासर खारिज कर दिया। अंततः स्कूल फोन घुमाया गया और मेरी पोल खुल गई, काटो तो खून नहीं। मुझे जैसे सांप सूंघ गया था। मेरी माताश्री पिताजी से भी ज्यादा ग़ुस्सेवाली हैं, वो आग में और घी डालने का काम कर रहीं थी। मुझे इन सब के बीच सिर्फ अब पिटने का ही इन्तेजार था, और तो अब मैं कुछ कर भी न सकता था। मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें सिर्फ छड़ी दिखा भर दो तो रोने लगते थे पर मेरे साथ ऐसा कुछ भी न था, मैं कइयों बार फिल्मे देखते हुए रो चुका था, कहानियाँ पढ़ते वक्त आंखे डबडबा चुकी थी पर छड़ी देखकर कभी न रोया था। रोने से पिटाई थोड़ी कम होती है ये बात मुझे अच्छे से मालूम थी, पर यहाँ चाह कर भी आंसू नहीं निकल रहे थे। इन्ही सब खयालों के बीच मुझ पर आक्रमण हो गया, माताजी झाड़ूओं से मारती थी और पिताजी के तो हाथ ही काफी थे। मेरा शरीर भी मेरे इन्द्रियों के वश में हो चुका था, मुझे सिर्फ मार की आवाज़ें सुनाई देती पर लगता तनिक भी न था। छोटी बहन छिप कर सारा तमाशा देख रही थी, पर वो करती भी क्या ? भैया ने कौन सा स्वर्ण पदक जीता है जो वाहवाही हो, स्कूल से भाग कर कौन सा बहादुरी वाला काम किया है ?
अब पिटाई का कार्यक्रम थम चुका था, जिस तूफान से मैं अबतक दूर भाग रहा था वह मुझे अब रौंद कर जा चुका था। मैं अब मार खाकर चुपचाप अपने कमरे में बैठ गया। सिर्फ एक लज्जा ही थी जो मुझे घेरे हुए थी, पर अपने करे पर मुझे कोई पछतावा न था। मैंने सारी मार भी शान के साथ सहन कर ली थी, पर अब दूसरी चिंता पीछे पड़ चुकी थी। अगर वो लड़का कल मास्टर जी से शिकायत कर दे तो वहाँ दुगनी पिटाई होगी और इस बार तो मैं अकेला ही रहूंगा, होमवर्क वाले तो अब तक पिट चुके होंगे।
तभी माताजी अंदर आई। माँ का दिल भी बहुत बड़ा होता है, वह अपने बच्चे को मारे पिटे पर दुनियां में सबसे ज्यादा प्यार अपने बच्चे से ही करती है। अब मेरी आँखें भर आईं और मैं रोने लगा, ये पता नही क्यों पर मैं रोये जा रहा था। शायद ये कल पिटने का भय था जो आंखों से निकल रहा था। माँ ने जब कारण पूछा तो मैंने झूठ बोल दिया कि इतनी दिन की छुट्टियाँ मनाने के बाद आज बिल्कुल भी स्कूल जानें कि इच्छा न थी, उन्हें मैं होमवर्क वाला कारण बता भी न सकता था।
दूसरा दिन हुआ, आज तो स्कूल जाना ही था। आज तो पिछले दिन से भी ज्यादा विचार दिमाग में आ रहे थे, कि जब लड़कों को पता चलेगा कि मैं स्कूल से भागा था तो क्या इज्जत रह जाएगी ? मैं हँसी का पात्र हो जाऊँगा, अब मुझे भी लोग हीन दृष्टि से देखेंगे। इज्जतदार लोगों के लिए इज्जत जान से भी ज्यादा कीमती होती है ये बात मुझे भलीभांति पता थी। दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धांत मैंने पढ़ रखा था पर सब कुछ सिर्फ जुबां पर ही था मष्तिष्क में नहीं। आज ऐसा समय था कि मैं उससे भी अच्छे तरीके से इस सिद्धांत की व्याख्या कर सकता था। समाज इंसान का शत्रु होता है, ये बात मुझे आज समझ आई। मैं उस दिन को कोस रहा था जब पिताजी ने मुझे कान्वेंट स्कूल में भेजने को बोला था और मैंने मना कर दिया था, वहाँ पर मार नहीं पड़ती, ज्यादा से ज्यादा डाँट दिया जाता है बस वो बहुत है। पर मैं अभागा इतना गलत निर्णय सिर्फ आज के दिन को देखने के लिए ही लिया था।
तभी पिताजी ने बुलाया और पूछा आज स्कूल में क्या जवाब दोगे जब पूछा जाएगा कल क्यों नहीं आये थे ? मैं खामोश रह गया। तब पिताजी ने एक सादा कागज और कलम मुझसे मंगाई और एक चिट्ठी तैयार की, जिसमें तबियत खराब का बहाना था। बस अब मेरे जान में जान आ चुकी थी, मुझे उस समय पिताजी में साक्षात ईश्वर के दर्शन हो रहे थे। फिर क्या था मैं फौरन स्कूल के लिए तैयार हुआ और स्कूल पहुंच गया।।।

Saturday, 21 January 2017

आरक्षण के साथ भारत का भविष्य

आज यात्राओं के दौरान या किसी भी मण्डली में बैठे लोगों के बीच आरक्षण का मुद्दा चर्चा का मुख्य विषय रहता है। इसके पक्ष विपक्ष में अनेकों तर्क वितर्क दिए जाते हैं, मैं उन सब की बात अभी नहीं करना चाहता अभी सिर्फ इस व्यवस्था के साथ भारत के भविष्य की बात करना चाहता हुँ। मुझमे अब एक भय समां चूका है भारत के भविष्य को लेकर। जिस तरह इस देश के राजनेता वोटों के लिए इस समस्या को गंभीर करते जा रहे हैं भारत का भविष्य अंधकार में जा रहा है। कुछ वर्षों पश्चात् एक ऐसा समय आएगा जब हमारे सिस्टम में आरक्षण एक स्थायी रूप ले चुका होगा और उस समय भारत की जनसंख्या भी एक विकराल रूप धारण कर चुकी होगी, ऐसे समय में जब बेरोजगारी अपने चरम पर होगी। ये ऐसा समय होगा जब सामान्य वर्ग का गुस्सा निश्चित ही रूप से फूटेगा, यहाँ पर यह वर्ग अपने सयंम की सीमा लांघकर आगे बढ़ेगा और विकराल दंगो की स्थिति उत्पन्न होगी, इस क्रांति पर किसी भी प्रकार से नियंत्रण करना लगभग असंभव सा होगा और इसका समाधान सिर्फ एक ही होगा, आरक्षण का अंत !! लेकिन यदि आरक्षण का अंत किया जाता है तो दूसरे वर्ग में भी उतनें ही आक्रोश की स्थिति रहेगी, मतलब दंगे जैसी स्थिति आनी ही है। इसके परिणामो से सभी वैसे वाकिफ ही हैं लेकिन जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है देश की अखंडता बनाये रखने की, जो की मुझे बिलकुल भी नहीं लगता ऐसे समय में मुमकिन होगा। ये देश टूटेगा, फिर से भारत और पाकिस्तान वाला समय आएगा और इसी बीच भारत का मुस्लिम समुदाय  एक अलग मुस्लिम देश की फिर से मांग रखेगा। ये होना लगभग निश्चित है अगर आज इसका समाधान नहीं खोजा गया तो ! आज भी आरक्षण के समर्थन में लाखों की भीड़ जमा हो जाती है बसें जलाई जाती हैं, रेल की पटरियां उखाड़ दी जाती हैं,अर्थात इसके विरोध में भी ऐसा ही होना है, लेकिन वो स्थिति और भी भयावह होगी शायद जिसकी आज कोई कल्पना भी नहीं कर रहा होगा। आज भी समय है, बदलाव लाना होगा, इन वोट के कीड़ों को हटाकर फेकना होगा तभी कुछ संभव है वरना इस देश के टुकड़े होने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती !! 

Saturday, 29 October 2016

भारतीय लोकतंत्र !

लोकतंत्र की जब शुरुआत हुई तो जितना इसे समर्थन मिला उतना ही विरोध भी हुआ। लोकतंत्र का आधार होता है मतदाता या फिर साफ शब्दों में कहा जाये तो उस देश या राज्य के वयस्क नागरिक। मतदाता ही लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं या उसे कमजोर करते हैं, क्योंकि लोकतंत्र को जनता के शासन के रूप में ही परिभाषित किया गया है। लोकतंत्र कमजोर हो जाता है, जब मतदाता अशिक्षित एवं अजागरुक होते हैं, और लोकतंत्र को मूर्खो का तंत्र बनने में समय नहीं लगता और इसके भयावह परिणाम निकलते है जैसे गरीबी, भ्रस्टाचार, बेरोजगारी, गुंडाराज, साम्प्रदायिकता आदि। देश का विकास शून्य हो जाता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमी ये है ही एक विद्वान पर दो मूर्खो की विजय हो जाती है। भारत में लोकतंत्र का मिला जुला रूप देखने को मिलता है वैसे ज्यादातर नकारात्मक पक्ष ही हैं, चुनाव में अधिकतर प्रत्याशी आपराधिक पृष्ठभूमि से होते हैं, अशिक्षा तो मानो अनिवार्य योग्यता हो चुनाव प्रत्याशी के लिए। लगभग सारे ही चुनाव, चाहे छोटे या बडे पद के लिए हों पैसो के दाम पर ही लडे जाते हैं और जिस पार्टी ने ज्यादा पैसा लगाया उसकी जीत। और भारतीय वोटर भी बड़ी मासूम कौम होती है साहब, एक मुर्गा और थोड़ी सी शराब बस, बिक गया भारतीय वोटर। और जो वोट्स खरीदे नहीं जा सकते उनके लिए जुमले। इन नेताओं के जुमलों में बड़ी शक्ति होती है, गजब का आकर्षण होता है, इंसान को पता होने के बावजूद की ये झूठ बोल रहा है, वोट कर आता है। भारत भले ही दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता हो पर राष्ट्र के तौर पर काफी युवा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक देश है। भारत में लोकतंत्र तब आया जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। यह संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। भारत में लोकतंत्र को एक मशीन की तरह आसानी से चलना चाहिए लेकिन कुछ हानिकारक तत्व इस काम में बाधा डालते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि भारत के संवैधानिक लक्ष्य और लोकतांत्रिक आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाती। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात पत्रकारिता भी आज पूरी तरह से बिक चुकी है। कार्पोरेट वर्ग के आने से यह मैली हो चूकी है, और नेताओं की गुलाम बन चुकी है। अब पत्रकारिता आम आदमी की आवाज नहीं है, मुझे तो नहीं दिखाई देती, बस TRP के लिए भूखे गीदड़ों की भीड़ नजर आती है। लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ तो टूटता ही दिखाई पड़ रहा, अब बची तीन में से तो दो पहले ही विफल हैं। न्यायपालिका आज संघर्ष करती दिखाई पड़ रही, और सिर्फ ये एकमात्र स्तंभ है जिस पर आज पूरा देश टिका है, जिस दिन ये टूटा यह देश भी टूट कर गिर पड़ेगा। यहाँ पर चिंता की बात ये है कि इसकी भी शुरुआत हो चुकी है, जस्टिस काटजू ने एक बार कहा था कि आज लगभग ५०% उच्च न्यायलय के जज भ्रस्ट हैं, यदि उनकी ये बात सच है तो निश्चित ही इस स्तम्भ नें भी चरमराना शुरू कर दिया है। अब सवाल ये उठता है की लोकतंत्र देश में मुह के बल गिर पड़ेगा या इसे बचाया जा सकता है ? हर समस्या का हल होता है  सो इसका भी है, इस समस्या का हल भी वहीँ पर है जहाँ से इसकी शुरुआत होती है। एकता में बड़ी शक्ति है, सबसे पहले सारे देशवासियों को अपनी जाती, अपना धर्म भुलाकर एक होना पड़ेगा क्योंकि इस देश में अक्सर चुनाव इसी आधार पर लडे जाते हैं। देश के बुद्धजीवियों को आगे आना होगा, वैसे ऐसा होना ही है पर सवाल ये है कि कहीं बहुत देर न हो जाये तो अभी ही क्यों नहीं ! इस विशाल भारत में कूटनीतिज्ञों की कमी नहीं है लेकिन कोई आगे नहीं आना चाहता। देश में राजनीती को गंदगी समझा जाता है, सबसे पहले तो ये मानसिकता बदलनी होगी। आज सोशल नेटवर्क ने आम आदमी को भी पहले से बहुत ज्यादा शक्तिशाली बना दिया है, विचारों का आदान प्रदान बहुत ही आसान हो चूका है। और सबसे पहले मतदाता को जागरूक होना पड़ेगा क्योंकि यही सारी समस्या की जड़ है, शिक्षित मतदाता किसी भी लोकतंत्र को सफल या असफल बनाते हैं। लोकतंत्र का पूरा ढांचा ठीक करने के लिए कुछ बुनियादी परिवर्तन - वर्तमान संसदीय प्रणाली में कुछ हमें संशोधनों के साथ बदलाव लाना होगा. मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का चुनाव सीधा जनता द्वारा होना चाहिए. पूरे चुनाव की व्यवस्था में धन का महत्व समाप्त किया जाना चाहिए. अनुपातिक चुनाव प्रणाली लागू की जाए. विश्व के कुछ देशो में यह प्रणाली सफलता पूर्वक काम कर रही है. चुनाव केवल पार्टियां लड़ें, उम्मेदवार नहीं और उनके चुनाव प्रचार का खर्च सरकार दे. आज हर वर्ष किसी ना किसी प्रदेश में चुनाव होता है. कानून द्वारा यह निश्चित कर दिया जाना चाहिए कि पूरे देश के सभी चुनाव पंचायत से लेकर संसद तक पांच वर्ष में एक समय पर केवल एक बार हों, जिससे सरकार के ही कई हज़ार करोड़ रुपये बचेंगे. आजकल भारत की लोकतंत्रता में सुधार लाना बहुत जरूरी है. राजनैतिक दलों को निहित स्वार्थों से ऊपर उठ कर देश और केवल देश के भविष्य का विचार करके पूरे लोकतंत्रता में एक पारदर्शिता और परिवर्तन लाने की हिम्मत करें। ये सभी प्रक्रियाएं देश को निश्चित ही देश को ऐसा लोकतंत्र दे सकती हैं जो सिर्फ नाम का ही नहीं, जिसमे आत्मा भी है।।

Friday, 21 October 2016

भारतीय पत्रकारिता की गिरती शाख

आज सूचना क्रांति के दौर में विश्व के किसी भी कोने में होने वाली घटना हमे क्षण भर में प्राप्त हो जाती है। ये वह दौर है जब पत्रकारिता का महत्व अपनी चरम सीमा पर पहुच चूका है। पत्रकारिता आज किसी भी देश का राजनितिक भविष्य तय करने में सक्षम है। बड़े से बड़े नेता अभिनेता बाहुबली सभी की साख आज पत्रकारों के हाथ में है। लोकतान्त्रिक देशों में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, अब ऐसे में पत्रकारिता का स्वछंद एवम निष्पक्ष होना अत्यंत अनिवार्य है। भारत की बात की जाए तो हमारे देश में पत्रकारिता का स्तर दिन प्रति दिन नीचे गिरता जा रहा है। देश की राजनीती की तरह ही लोभी व् पाखंडी भेड़िये पत्रकारिता में अपनी जड़ें मजबूत कर रहें हैं। आज पत्रकारिता सिर्फ पैसे छापने की मशीन बन चूका है, अब ऐसे में पत्रकारिता का विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है। आप किसी भी टीवी चैनल की पत्रकारिता देखकर चंद मिनटों में ही बता सकते हैं कि इस चैनेल का उद्द्देश्य क्या है और यह किस राजनितिक पार्टी का प्रशंशक है। आज लगभग सारे समाचार चैनल्स सिर्फ और सिर्फ राजनितिक समाचारों में ही व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। रोजमर्रा की शिकायतों से बहुत दूर, आम आदमी की समस्याओं को नकारते हुए बस पैसे छापे जा रहें हैं। मैराथन advertisments सभी चैनल्स का एक अभिन्न हिस्सा बन चूका है, ऐसे में समाचार पत्रों का भी हाल बिलकुल ऐसा ही है। 100 खबरों के नाम पर 1 न्यूज़ को 4 बार दिखाया जाता है, और 100 में से 50 तो सिर्फ बलात्कार की ही खबरे रहती हैं, जो की उस सुपरफास्ट 100 के साथ ठन्डे बस्ते में समां जाती हैं। यदि देश में कोई छुट पुट घटना हो जाये तो बस फिर बात ही क्या पुरे 24 घंटे सारे के सारे चैनल्स अपना राग अलापते नजर आएंगे। पत्रकारिता के नाम पर आज कुछ समाचार पत्र थोड़े बहुत बचे हुए हैं, पर इस गन्दगी से वो भी अछूते नहीं है। अब यदि उदाहरण लिया जाये तो 2 भारतीय पत्रकारों की बात करना चाहूंगा। ये नाम है राजदीप सरदेसाई और रवीश कुमार, दोनों की आज भारतीय पत्रकारिता में ऊँचा नाम रखते हैं। अब इन दोनों पत्रकारों की हाल में ही हुई JNU की प्रतिक्रिया देखते हैं। दोनों ही पत्रकारों ने JNU में हुई इस घटना को सही ठहराया और तर्क दिया की संविधान हमे अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता भी देता है, बल्कि सच तो यह है कि संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 6 तरह के प्रतिबंध लगाता है। अब ये किसे मूर्ख बना रहे हैं ? भारत की भोली जनता को ? मैंने भी संविधान पढ़ा है, अनुच्छेद 19(2) में स्पष्ट तौर पर 6 बाध्यताएं आरोपित की गई हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित करती हैं।अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है राष्ट्र की सुरक्षा को जिस भाषण से खतरा हो। 
'भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’,  ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’। क्या इस भाषण में देश को नष्ट करने की गूंज नहीं है? क्या ये नारे भारत विरोधी नहीं हैं ? शायद कुछ के लिए ना भी हों पर मेरे जैसे देशप्रेमी के लिए तो बेशक ही हैं।
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है उच्च व सर्वोच्च अदालत की अवमानना। अब ये JNU के क्रन्तिकारी आगे कहते हैं ‘अफजल हम शर्मिन्दा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’। अब बताइए अफजल को फांसी की सजा देने वाला सुप्रीम कोर्ट कातिल बताया जा रहा है, अफजल को क्षमादान न देने वाले राष्ट्रपति को कातिल बताया जा रहा है और यह पूरी कानूनी प्रक्रिया जिस संविधान पर टिका है, उसे भी कातिल कहा जा रहा है!
क्या यह देश की कानूनी प्रक्रिया को खुली चुनौती नहीं है? उमर खालिद ने तो टीवी स्टूडियो में बैठ कर सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देते हुए कहा है- कुछ जज मिलकर कोई फैसला नहीं कर सकते! यह साफ तौर पर देश के कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है। यह बिलकुल हास्यप्रद है, इस देश में संसद, जिस पर देश टिका हुआ है उसे भी कोर्ट की आदेश पर टिपण्णी का अधिकार नहीं है। ऊँचे से ऊँचे ओहदे पर बैठा व्यक्ति भी सुप्रीम कोर्ट के सामने माननीय शब्द का उपयोग करता है उस सुप्रीम कोर्ट का ऐसा भद्दा मज़ाक असहनीय है। 
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता पर हमला अभिव्यक्ति की आज़ादी बिलकुल नहीं है ।अब ये क्रन्तिकारी कहते हैं  ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी’, ‘केरल की आजादी तक, जंग रहेगी’। क्या यह भारत के टुकड़े करने की सोच देश की संप्रभुता पर प्रहार नहीं है? अब बताइए क्या राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल, सीताराम येचुरी, डी राजा, केसी त्यागी, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई आदि देशद्रोहियों के ये साथी क्या संविधान से अनभिज्ञ हैं? जी नहीं, ये संविधान से अनभिज्ञ नहीं हैं, बल्कि देश की सरकार और कानून व्यवस्था को बंधक बनाने के लिए दबाव की राजनीति कर रहे हैं, जिसमें वो काफी हद तक सफल हो चुके हैं! आप देखिए जेएनयू को उमर खालिद व उसके साथी एक आतंक स्थल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और देश की कानून व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहे हैं। न ये लोग अफजल पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मानने को तैयार होते हैं और न भारत की कानून व्यवस्था के सम्मुख प्रस्तुत हो खुद को निर्दोष साबित करने को तैयार होते हैं! उल्टा कह रहे होते हैं कि हमलोगों से पंगा लेना इन्हें महंगा पड़ेगा। देश को खुली चुनौती और किसे कहते हैं? रवीश कुमार और राजदीप सरदेसाई जैसे वामपंथी पत्रकारों ने जनता को देशद्रोह जैसे मूल मुद्दे से भटकाने का प्रयास किया है। इससे बड़ी फासिस्ट सोच और क्या होगी कि जनता की स्वतंत्र सोच को किसी पार्टी व संगठन की सोच से जोड़ दिया जाए ताकि देशद्रोहियों पर जनता बात करना ही बंद कर दे? देश के कानून और संविधान को जिस तरह से ये क्रांतिकारी चुनौती दे रहे हैं, रवीश व राजदीप जैसे वामपंथी भी बौद्धिक चासनी में लपेट कर उसी तरह संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं! दोगलपन-पाखंड और किसे कहते हैं? मुझे सिर्फ इतना पता है कि देश सर्वोपरि होता है। देश की आज़ादी से लेकर देश निर्माण तक पत्रकारिता का योगदान अमूल्य है। लेकिन वर्तमान समय में इस पत्रकारिता पे दाग लगे हैं, पत्रकारिता अपने मार्ग से भटकी हुई नजर आती है, सिर्फ TRP बटोरने तक ही मीडिया का ध्यान नजर आता है, अब ऐसे में देश की पत्रकारिता में फिर से क्रांति की जरूरत है क्योंकि यदि लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ डगमगाया तो पूरा का पूरा लोकतंत्र ही चरमरा जायेगा। अवाम की आवाज कही जाने वाले पत्रकारिता को फिर से अपने उसी उद्द्देश्य की ओर लौटना होगा जिसके लिए इसकी रचना की गयी थी।
अब लेख का अंत एक पत्रकार की पत्रकारिता पर कविता से करना चाहूंगा::
"अपने वास्ते हम बेदर्द होते हैं......."
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं
दुनियां भर के दर्द को अपनीखबर बनाने वालेअपने वास्ते बेदर्द होते हैंआंखों पर चश्मा चढ़ायेकमीज की जेब पर पेन लटकायेकभी कभी हाथों में माइक थमायेचहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबरस्वयं से होते बेखबरकभी खाने को तो कभी पानी को तरसेकभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसेदूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैंमुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैंलाख चाहे कहोआदमी से जमाना होता हैखबरची भी होता है आदमीजिसे पेट के लिये कमाना होता हैदूसरों के दर्द की खबर देने के लियेखुद का पी जाना होता हैभले ही वह एक क्यों न होउसका पिया दर्द भीजमाने के लिए गरल होताखबरों से अपने महल सजाने वालेबादशाह चाहेअपनी खबरों से जमाने कोजगाने की बात भले ही करते होंपर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैंकभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरचीखोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोलपर फिर भी नहीं देते खबरअपने प्रति वह बेदर्द होते हैं

खबरों की खबर वह रखते हैं।।
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Thursday, 20 October 2016

भारत और चीन

भारत और चीन आज दोनों ही देश विश्व महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं, चीन ने तो काफी हद तक सफलता भी प्राप्त कर ली है लेकिन भारत को अभी भी लंबा सफर तय करना है। यदि इतिहास की ओर देखें तो भारत और चीन के सम्बन्ध हमेशा से अच्छे रहे हैं, दोनों ही देशो में व्यापार होता रहा है, दोनों ही देशो से विद्वान आपस में ज्ञान का साझा करते रहें है। लेकिन आजादी के बाद से दोनों देशों के सम्बन्ध में थोड़ा बदलाव आया, जो की 1962 के युद्ध के बाद साफ साफ दिखाई पड़ने लगा। हिंदी चीनी भाई भाई का नारा भारतीय नेताओं के चुनावी वादों की तरह ही ठन्डे बस्ते में समां गया। आज समय बिलकुल बदल चूका है, दोनों ही देशो में आज भी एक शीत युद्ध चल रहा है। यहाँ पर समस्या की बात, भारत का समय से पिछड़ना और चीन का लगातार आगे बढ़ना है, जो की भारत के लिए मुश्किल खड़ा करता रहा है। चीन कूटनीति के दांव में भारत से बेहतर होता दिखाई पड़ रहा है, और उसकी कूटनीति का अभेद हिस्सा है पाकिस्तान। चीन हमेशा से ही पाकिस्तान के कंधे पर बन्दूक रखकर भारत पर हमले करता रहा है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त, इस बात को चीन ने बखूबी समझा और पाकिस्तान को अपना हथियार बना लिया, और पकिस्तान भी मूर्खता की मिसाल पेश करते हुए चीन का गुलाम बना हुआ है। कश्मीर पाकिस्तान को कभी नहीं मिल सकता ये बात वह भी बखूबी जानता है लेकिन फिर भी हार मानने को तैयार नहीं है। पकिस्तान अपनी भूखी, अनपढ़ और बेरोजगार जनसँख्या का ध्यान इन चीज़ों से भटका कर कश्मीर पर रखना चाह रहा है, जिससे की कोई आवाज न उठा सके। अब यदि भारत की बात की जाये तो भारत की स्थिति भी पाकिस्तान से मिलती जुलती ही है, यक़ीनन हमारी अर्थव्यवस्था उनसे बेहतर है लेकिन आज भी भारत की बड़ी जनसँख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है, लोगो के घरों में शौचालय तक सरकारी मदद से बन रहे हैं। बेरोजगारी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। देश जातिवाद, धर्म, भाषा आदि में बटा हुआ है, जनसँख्या भी बेकाबू होती जा रही है, लोगो का जीवन स्तर गिरता जा रहा है। सरल शब्दों में कहा जाये तो भारत और पाकिस्तान के लोगो के जीवन स्तर में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। वहीँ दूसरी तरफ चीन तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहा है। इसका सबसे प्रमुख कारण जो सामने आता है वह है भारत का लोकतंत्रात्मक देश होना, जो की भारत के लिए गले की हड्डी बन गया। देश की विभिन्न पार्टियों ने सिर्फ और सिर्फ चुनाव जीतने के प्रयास किये, भारत की जनता को सिर्फ वोटो की तरह ही देखा गया। देश की समस्या का कोई ठोस हल कभी ढूँढा ही नहीं गया। चीन के पास विशाल क्षेत्रफल है जो की भारत का लगभग तिगुना है फिर भी चीन ने अपनी जनसँख्या काबू करने के लिए अथक प्रयास किये। किसी भी देश की सबसे बड़ी पूँजी उसकी कार्यशील जनसंख्या होती है पर भारत में इसका विपरीत हुआ। यहाँ पर जनसँख्या न तो कार्यशील है और न ही कुशल। फलतः जनसँख्या का विशाल होना भारत की एक बड़ी चुनौती बन चूका है। और ये एक ऐसी चुनौती है जिससे पार पाना कम से कम अगले 50-60 वर्षो तक नामुमकिन नजर आ रहा है। 2014 के चुनाव के बाद आई नयी सरकार ने कुछ नये कदम उठाये हैं जैसे कुशल भारत अभियान। यदि यह अभियान सफल होता है तो निश्चित रूप से एक नए भारत का उद्भव संभव है। मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया भारत की विकास की दिशा बदल सकते हैं यद्दपि ये सफल हो तो। भारत की एक बड़ी जनसँख्या आज भी कृषि कार्य में ही लगी है जबकि देश की जीडीपी में कृषि का योगदान महज १४% ही रह गया है, इस जनसँख्या को जल्द से जल्द दूसरे कार्यों में संलग्न करना होगा, खासकर तकनिकी क्षेत्र में जहाँ पर भारत चीन से पिछड़ रहा है। आज हमारी जरूरतों की छोटी मोटी वस्तुएँ भी चीन से आयत होती हैं, सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि हम लगभग सभी विकसित देशों पर आज निर्भर हैं। जब तक देश का तकनिकी ज्ञान नहीं बढ़ता हम पीछे ही रहेंगे। हम आज भी मातृभाषा का महत्व नहीं समझ पाए हैं, देश की तकनिकी पढाई में मातृभाषा को महत्व ना देना भारत की सबसे बड़ी भूल है यहाँ पर मैं दोहराना चाहूंगा "सबसे बड़ी भूल"। इस गलती ने देश को चीन से बहुत पीछे छोड़ दिया। हमारी तकनिकी विकास में पूर्ण विराम लगाने का श्रेय बहुत हद तक अंग्रेजी को भी जाता है। तकनिकी ज्ञान में सीखना जरूरी होता है न की डिग्री होना, यहाँ पर देश का एक बड़ा छात्र वर्ग उस ज्ञान से वंचित रह गया। दक्षिण भारत की हिंदी को न अपनाने की जिद ने भारत की एकता पर करारा प्रहार किया। अब ऐसे हालातों में भारत का चीन से पीछे होना लाजमी ही है। आज भारत-चीन के बीच अर्थव्यवस्था का कोई मुकाबला नहीं है आंकड़ों के मुताबिक-
1. भारत की जीडीपी 2.04 ट्रिलियन है जबकि चीन की जीडीपी 10.35 ट्रिलियन है।
2.  चीन की विकास दर 7.1 फीसदी है जबकि भारत की 7.5 फीसदी है। भले ही मौजूदा समय में भारत की विकास दर चीन से आगे निकल रही है लेकिन चीन काफी समय तक उच्च विकास दर से प्रगति कर रहा था, जो की 10 से ऊपर थी और भारत की 5-6 के इर्द गिर्द ही घूमती रही।
3.  भारत में प्रति व्यक्ति आय1 लाख 4 हजार सालाना है। तो चीन में प्रति व्यक्ति आय 4 लाख 96 हजार रुपये सालाना है।
4. इतना ही नहीं विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में भी चीन से भारत काफी पीछे है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार जहां 139.29 बिलियन है वहीं चीन का 4009 बिलियन।
5. चीन का रक्षा बजट जहां 166 बिलियन है तो वहीं भारत का रक्षा बजट 45 बिलियन है।
6. निर्यात और व्यापारिक घाटा में भारत चीन के बीच कोई मुकाबला नहीं है। भारत से चीन को 11.95 बिलियन डॉलर का निर्यात होता है जबकि चीन से भारत को 60.39 बिलियन डॉलर का निर्यात होता है।


7.अमेरिका की एक आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और वैश्विक विकास के क्षेत्र में चीन से काफी पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका इस मामले में भारत से काफी आगे है तो चीन में अनुसंधान और विकास के क्षेत्र पर खर्च में सबसे तेजी से आगे बढ़ रहा है। अनुसन्धान किसी भी देश के लिए अमृत का कार्य करते हैं। भारत को यदि तीव्र विकास करना है तो अनुसंधानों पर अत्यधिक जोर देना होगा।


कहा जाता है कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते, यदि इन आंकड़ों पर गौर किया जाये तो भारत चीन के सामने कहीं भी नहीं ठहरता। हमारी मानसिकता हमेशा से यह रही है कि हम पाकिस्तान से कितना आगे हैं, और ये मानसिकता हमारे लिए घातक साबित हुई। हमने हमेशा से ही अपनी तुलना पाकिस्तान जैसे पिछड़े देश से की है, और खुश होकर खुद से अपनी पीठ थपथपाई । यदि भारत को चीन से आगे निकलने की जिद है तो सबसे पहले अपनी जनसँख्या को शिक्षित करना होगा, और उसे विकास के कार्यों से जोड़ना होगा। सब्सिडी ख़त्म करके वह पैसा निर्माण कार्यों एवं तकनिकी विकास में लगाना होगा। मध्यम वर्ग के करों के पैसे का दुरूपयोग बंद करना होगा। सस्ते खाद्यान जैसी प्रथाओं को बंद करके लोगो को कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। आरक्षण जैसे गंभीर व्यवस्थाओं के बारे में पुनः विचार करना होगा। जनमानस को भी देश के विकास में पूर्ण सहयोग देना होगा। सरकार में सिर्फ योग्य व्यक्ति ही आएं, गुंडाराज, परिवारवाद और पैसे वाली राजनीती ख़त्म करनी होगी। सारे देशवाशियों को अनुशासन में रहकर देश को सर्वोपरि मनना होगा चाहे वह किसी भी धर्म का हो या किसी भी जाती का। यदि ऐसा हो जाता है तो मुझे पूर्ण विश्वास है आने वाले समय में भारत को विश्वशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता।।।