लोकतंत्र की जब शुरुआत हुई तो जितना इसे समर्थन मिला उतना ही विरोध भी हुआ। लोकतंत्र का आधार होता है मतदाता या फिर साफ शब्दों में कहा जाये तो उस देश या राज्य के वयस्क नागरिक। मतदाता ही लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं या उसे कमजोर करते हैं, क्योंकि लोकतंत्र को जनता के शासन के रूप में ही परिभाषित किया गया है। लोकतंत्र कमजोर हो जाता है, जब मतदाता अशिक्षित एवं अजागरुक होते हैं, और लोकतंत्र को मूर्खो का तंत्र बनने में समय नहीं लगता और इसके भयावह परिणाम निकलते है जैसे गरीबी, भ्रस्टाचार, बेरोजगारी, गुंडाराज, साम्प्रदायिकता आदि। देश का विकास शून्य हो जाता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमी ये है ही एक विद्वान पर दो मूर्खो की विजय हो जाती है। भारत में लोकतंत्र का मिला जुला रूप देखने को मिलता है वैसे ज्यादातर नकारात्मक पक्ष ही हैं, चुनाव में अधिकतर प्रत्याशी आपराधिक पृष्ठभूमि से होते हैं, अशिक्षा तो मानो अनिवार्य योग्यता हो चुनाव प्रत्याशी के लिए। लगभग सारे ही चुनाव, चाहे छोटे या बडे पद के लिए हों पैसो के दाम पर ही लडे जाते हैं और जिस पार्टी ने ज्यादा पैसा लगाया उसकी जीत। और भारतीय वोटर भी बड़ी मासूम कौम होती है साहब, एक मुर्गा और थोड़ी सी शराब बस, बिक गया भारतीय वोटर। और जो वोट्स खरीदे नहीं जा सकते उनके लिए जुमले। इन नेताओं के जुमलों में बड़ी शक्ति होती है, गजब का आकर्षण होता है, इंसान को पता होने के बावजूद की ये झूठ बोल रहा है, वोट कर आता है। भारत भले ही दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता हो पर राष्ट्र के तौर पर काफी युवा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक देश है। भारत में लोकतंत्र तब आया जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। यह संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। भारत में लोकतंत्र को एक मशीन की तरह आसानी से चलना चाहिए लेकिन कुछ हानिकारक तत्व इस काम में बाधा डालते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि भारत के संवैधानिक लक्ष्य और लोकतांत्रिक आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाती। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात पत्रकारिता भी आज पूरी तरह से बिक चुकी है। कार्पोरेट वर्ग के आने से यह मैली हो चूकी है, और नेताओं की गुलाम बन चुकी है। अब पत्रकारिता आम आदमी की आवाज नहीं है, मुझे तो नहीं दिखाई देती, बस TRP के लिए भूखे गीदड़ों की भीड़ नजर आती है। लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ तो टूटता ही दिखाई पड़ रहा, अब बची तीन में से तो दो पहले ही विफल हैं। न्यायपालिका आज संघर्ष करती दिखाई पड़ रही, और सिर्फ ये एकमात्र स्तंभ है जिस पर आज पूरा देश टिका है, जिस दिन ये टूटा यह देश भी टूट कर गिर पड़ेगा। यहाँ पर चिंता की बात ये है कि इसकी भी शुरुआत हो चुकी है, जस्टिस काटजू ने एक बार कहा था कि आज लगभग ५०% उच्च न्यायलय के जज भ्रस्ट हैं, यदि उनकी ये बात सच है तो निश्चित ही इस स्तम्भ नें भी चरमराना शुरू कर दिया है। अब सवाल ये उठता है की लोकतंत्र देश में मुह के बल गिर पड़ेगा या इसे बचाया जा सकता है ? हर समस्या का हल होता है सो इसका भी है, इस समस्या का हल भी वहीँ पर है जहाँ से इसकी शुरुआत होती है। एकता में बड़ी शक्ति है, सबसे पहले सारे देशवासियों को अपनी जाती, अपना धर्म भुलाकर एक होना पड़ेगा क्योंकि इस देश में अक्सर चुनाव इसी आधार पर लडे जाते हैं। देश के बुद्धजीवियों को आगे आना होगा, वैसे ऐसा होना ही है पर सवाल ये है कि कहीं बहुत देर न हो जाये तो अभी ही क्यों नहीं ! इस विशाल भारत में कूटनीतिज्ञों की कमी नहीं है लेकिन कोई आगे नहीं आना चाहता। देश में राजनीती को गंदगी समझा जाता है, सबसे पहले तो ये मानसिकता बदलनी होगी। आज सोशल नेटवर्क ने आम आदमी को भी पहले से बहुत ज्यादा शक्तिशाली बना दिया है, विचारों का आदान प्रदान बहुत ही आसान हो चूका है। और सबसे पहले मतदाता को जागरूक होना पड़ेगा क्योंकि यही सारी समस्या की जड़ है, शिक्षित मतदाता किसी भी लोकतंत्र को सफल या असफल बनाते हैं। लोकतंत्र का पूरा ढांचा ठीक करने के लिए कुछ बुनियादी परिवर्तन - वर्तमान संसदीय प्रणाली में कुछ हमें संशोधनों के साथ बदलाव लाना होगा. मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का चुनाव सीधा जनता द्वारा होना चाहिए. पूरे चुनाव की व्यवस्था में धन का महत्व समाप्त किया जाना चाहिए. अनुपातिक चुनाव प्रणाली लागू की जाए. विश्व के कुछ देशो में यह प्रणाली सफलता पूर्वक काम कर रही है. चुनाव केवल पार्टियां लड़ें, उम्मेदवार नहीं और उनके चुनाव प्रचार का खर्च सरकार दे. आज हर वर्ष किसी ना किसी प्रदेश में चुनाव होता है. कानून द्वारा यह निश्चित कर दिया जाना चाहिए कि पूरे देश के सभी चुनाव पंचायत से लेकर संसद तक पांच वर्ष में एक समय पर केवल एक बार हों, जिससे सरकार के ही कई हज़ार करोड़ रुपये बचेंगे. आजकल भारत की लोकतंत्रता में सुधार लाना बहुत जरूरी है. राजनैतिक दलों को निहित स्वार्थों से ऊपर उठ कर देश और केवल देश के भविष्य का विचार करके पूरे लोकतंत्रता में एक पारदर्शिता और परिवर्तन लाने की हिम्मत करें। ये सभी प्रक्रियाएं देश को निश्चित ही देश को ऐसा लोकतंत्र दे सकती हैं जो सिर्फ नाम का ही नहीं, जिसमे आत्मा भी है।।
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