आज सूचना क्रांति के दौर में विश्व के किसी भी कोने में होने वाली घटना हमे क्षण भर में प्राप्त हो जाती है। ये वह दौर है जब पत्रकारिता का महत्व अपनी चरम सीमा पर पहुच चूका है। पत्रकारिता आज किसी भी देश का राजनितिक भविष्य तय करने में सक्षम है। बड़े से बड़े नेता अभिनेता बाहुबली सभी की साख आज पत्रकारों के हाथ में है। लोकतान्त्रिक देशों में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, अब ऐसे में पत्रकारिता का स्वछंद एवम निष्पक्ष होना अत्यंत अनिवार्य है। भारत की बात की जाए तो हमारे देश में पत्रकारिता का स्तर दिन प्रति दिन नीचे गिरता जा रहा है। देश की राजनीती की तरह ही लोभी व् पाखंडी भेड़िये पत्रकारिता में अपनी जड़ें मजबूत कर रहें हैं। आज पत्रकारिता सिर्फ पैसे छापने की मशीन बन चूका है, अब ऐसे में पत्रकारिता का विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है। आप किसी भी टीवी चैनल की पत्रकारिता देखकर चंद मिनटों में ही बता सकते हैं कि इस चैनेल का उद्द्देश्य क्या है और यह किस राजनितिक पार्टी का प्रशंशक है। आज लगभग सारे समाचार चैनल्स सिर्फ और सिर्फ राजनितिक समाचारों में ही व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। रोजमर्रा की शिकायतों से बहुत दूर, आम आदमी की समस्याओं को नकारते हुए बस पैसे छापे जा रहें हैं। मैराथन advertisments सभी चैनल्स का एक अभिन्न हिस्सा बन चूका है, ऐसे में समाचार पत्रों का भी हाल बिलकुल ऐसा ही है। 100 खबरों के नाम पर 1 न्यूज़ को 4 बार दिखाया जाता है, और 100 में से 50 तो सिर्फ बलात्कार की ही खबरे रहती हैं, जो की उस सुपरफास्ट 100 के साथ ठन्डे बस्ते में समां जाती हैं। यदि देश में कोई छुट पुट घटना हो जाये तो बस फिर बात ही क्या पुरे 24 घंटे सारे के सारे चैनल्स अपना राग अलापते नजर आएंगे। पत्रकारिता के नाम पर आज कुछ समाचार पत्र थोड़े बहुत बचे हुए हैं, पर इस गन्दगी से वो भी अछूते नहीं है। अब यदि उदाहरण लिया जाये तो 2 भारतीय पत्रकारों की बात करना चाहूंगा। ये नाम है राजदीप सरदेसाई और रवीश कुमार, दोनों की आज भारतीय पत्रकारिता में ऊँचा नाम रखते हैं। अब इन दोनों पत्रकारों की हाल में ही हुई JNU की प्रतिक्रिया देखते हैं। दोनों ही पत्रकारों ने JNU में हुई इस घटना को सही ठहराया और तर्क दिया की संविधान हमे अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता भी देता है, बल्कि सच तो यह है कि संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 6 तरह के प्रतिबंध लगाता है। अब ये किसे मूर्ख बना रहे हैं ? भारत की भोली जनता को ? मैंने भी संविधान पढ़ा है, अनुच्छेद 19(2) में स्पष्ट तौर पर 6 बाध्यताएं आरोपित की गई हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित करती हैं।अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है राष्ट्र की सुरक्षा को जिस भाषण से खतरा हो।
'भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’। क्या इस भाषण में देश को नष्ट करने की गूंज नहीं है? क्या ये नारे भारत विरोधी नहीं हैं ? शायद कुछ के लिए ना भी हों पर मेरे जैसे देशप्रेमी के लिए तो बेशक ही हैं।
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है उच्च व सर्वोच्च अदालत की अवमानना। अब ये JNU के क्रन्तिकारी आगे कहते हैं ‘अफजल हम शर्मिन्दा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’। अब बताइए अफजल को फांसी की सजा देने वाला सुप्रीम कोर्ट कातिल बताया जा रहा है, अफजल को क्षमादान न देने वाले राष्ट्रपति को कातिल बताया जा रहा है और यह पूरी कानूनी प्रक्रिया जिस संविधान पर टिका है, उसे भी कातिल कहा जा रहा है!
क्या यह देश की कानूनी प्रक्रिया को खुली चुनौती नहीं है? उमर खालिद ने तो टीवी स्टूडियो में बैठ कर सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देते हुए कहा है- कुछ जज मिलकर कोई फैसला नहीं कर सकते! यह साफ तौर पर देश के कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है। यह बिलकुल हास्यप्रद है, इस देश में संसद, जिस पर देश टिका हुआ है उसे भी कोर्ट की आदेश पर टिपण्णी का अधिकार नहीं है। ऊँचे से ऊँचे ओहदे पर बैठा व्यक्ति भी सुप्रीम कोर्ट के सामने माननीय शब्द का उपयोग करता है उस सुप्रीम कोर्ट का ऐसा भद्दा मज़ाक असहनीय है।
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता पर हमला अभिव्यक्ति की आज़ादी बिलकुल नहीं है ।अब ये क्रन्तिकारी कहते हैं ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी’, ‘केरल की आजादी तक, जंग रहेगी’। क्या यह भारत के टुकड़े करने की सोच देश की संप्रभुता पर प्रहार नहीं है? अब बताइए क्या राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल, सीताराम येचुरी, डी राजा, केसी त्यागी, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई आदि देशद्रोहियों के ये साथी क्या संविधान से अनभिज्ञ हैं? जी नहीं, ये संविधान से अनभिज्ञ नहीं हैं, बल्कि देश की सरकार और कानून व्यवस्था को बंधक बनाने के लिए दबाव की राजनीति कर रहे हैं, जिसमें वो काफी हद तक सफल हो चुके हैं! आप देखिए जेएनयू को उमर खालिद व उसके साथी एक आतंक स्थल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और देश की कानून व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहे हैं। न ये लोग अफजल पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मानने को तैयार होते हैं और न भारत की कानून व्यवस्था के सम्मुख प्रस्तुत हो खुद को निर्दोष साबित करने को तैयार होते हैं! उल्टा कह रहे होते हैं कि हमलोगों से पंगा लेना इन्हें महंगा पड़ेगा। देश को खुली चुनौती और किसे कहते हैं? रवीश कुमार और राजदीप सरदेसाई जैसे वामपंथी पत्रकारों ने जनता को देशद्रोह जैसे मूल मुद्दे से भटकाने का प्रयास किया है। इससे बड़ी फासिस्ट सोच और क्या होगी कि जनता की स्वतंत्र सोच को किसी पार्टी व संगठन की सोच से जोड़ दिया जाए ताकि देशद्रोहियों पर जनता बात करना ही बंद कर दे? देश के कानून और संविधान को जिस तरह से ये क्रांतिकारी चुनौती दे रहे हैं, रवीश व राजदीप जैसे वामपंथी भी बौद्धिक चासनी में लपेट कर उसी तरह संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं! दोगलपन-पाखंड और किसे कहते हैं? मुझे सिर्फ इतना पता है कि देश सर्वोपरि होता है। देश की आज़ादी से लेकर देश निर्माण तक पत्रकारिता का योगदान अमूल्य है। लेकिन वर्तमान समय में इस पत्रकारिता पे दाग लगे हैं, पत्रकारिता अपने मार्ग से भटकी हुई नजर आती है, सिर्फ TRP बटोरने तक ही मीडिया का ध्यान नजर आता है, अब ऐसे में देश की पत्रकारिता में फिर से क्रांति की जरूरत है क्योंकि यदि लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ डगमगाया तो पूरा का पूरा लोकतंत्र ही चरमरा जायेगा। अवाम की आवाज कही जाने वाले पत्रकारिता को फिर से अपने उसी उद्द्देश्य की ओर लौटना होगा जिसके लिए इसकी रचना की गयी थी।
अब लेख का अंत एक पत्रकार की पत्रकारिता पर कविता से करना चाहूंगा::
"अपने वास्ते हम बेदर्द होते हैं......."
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं
दुनियां भर के दर्द को अपनीखबर बनाने वालेअपने वास्ते बेदर्द होते हैंआंखों पर चश्मा चढ़ायेकमीज की जेब पर पेन लटकायेकभी कभी हाथों में माइक थमायेचहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबरस्वयं से होते बेखबरकभी खाने को तो कभी पानी को तरसेकभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसेदूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैंमुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैंलाख चाहे कहोआदमी से जमाना होता हैखबरची भी होता है आदमीजिसे पेट के लिये कमाना होता हैदूसरों के दर्द की खबर देने के लियेखुद का पी जाना होता हैभले ही वह एक क्यों न होउसका पिया दर्द भीजमाने के लिए गरल होताखबरों से अपने महल सजाने वालेबादशाह चाहेअपनी खबरों से जमाने कोजगाने की बात भले ही करते होंपर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैंकभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरचीखोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोलपर फिर भी नहीं देते खबरअपने प्रति वह बेदर्द होते हैं
खबरों की खबर वह रखते हैं।।
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